221. काचा धन       

काचा धन” संचह मूरख गावार । मनमुख भूले अंध गावार ।

बिखिआ कै धन सदा दुख होइ । ना साथ जाई - न परापत होई ।

साचा धन गुरमती पाऐ । काचा धन फुन आवै जाऐ ।

मनमुख भूले सभ मरह गवार । भवजल डूबे न उरवार न पार ।

सतिगुरु भेटे पूरै भाग । साच रते अहिनिस बैराग ।

चहु जुग मह अम्रित साची बाणी । पूरै भाग हरि नाम समाणी ।

सिध-साधिक तरसह सभ लोई । पूरै भाग परापत होई ।

सभ किछ साचा - साचा है सोई । ऊतम ब्रहम पछाणै कोई ।

सच साचा सच आप द्रिड़ाऐ । नानक आपे वेखै आपे सच लाऐ ।(665-14)

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