“काचा धन” संचह मूरख
गावार । मनमुख
भूले अंध गावार
। बिखिआ
कै धन सदा दुख होइ
। ना साथ जाई - न परापत
होई । साचा
धन गुरमती पाऐ
। काचा धन फुन आवै
जाऐ । मनमुख
भूले सभ मरह गवार
। भवजल डूबे न उरवार
न पार । सतिगुरु
भेटे पूरै भाग
। साच रते अहिनिस
बैराग । चहु
जुग मह अम्रित
साची बाणी । पूरै
भाग हरि नाम समाणी
। सिध-साधिक
तरसह सभ लोई । पूरै
भाग परापत होई
। सभ किछ
साचा - साचा है सोई
। ऊतम ब्रहम पछाणै
कोई । सच साचा
सच आप द्रिड़ाऐ
। नानक आपे वेखै
आपे सच लाऐ ।(665-14)
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