29.सावधानी

Ø युवाओं को ब्वाय फ्रैंड़ या गर्ल फ्रैंड़ ढ़ूंडने के ब्जाय अपने सगे-शुभचिंतको सहित पति अथवा पत्नी की ही तलाश करना ज्यादा फायदेमंद सौदा हैं । वीर्य तथा ऐग के बनते ही प्रत्येक शरीर की प्राकृतिक मांग आवश्यक रूप से प्रत्यक्ष हो जाती हैं । अतः किसी भी तरह से इसे रोकना असंभव सा हो जाता हैं तथा रोकने पर बुद्धि विकृत होने लगती हैं विभिन्न दिशाओं में बहती हुई अपराधिक मानसिकता को जन्म देती हैं । लेकिन ब्याह अथवा ड़िलीवरी स्वास्थिक र्निधारित अविधि विशेष के बाद ही सम्पन्न करना अनिवार्य हैं । “अति उत्तम ” तो र्निधारित मर्यादित अविधि तक “ संयम ” में रहना ही अधिक श्रेष्ठ गुणकारी विशेष हैं सात्विकता विशेष को अपनाते हुऐ ।

Ø बालिग अवस्था में यदि कोई आप का निर्णय आप के शुभचिंतको के निर्णय के अनुरूप नंही हैं तो आप अपने निर्णयों के लिये स्वंय ही जिम्मेदार विशेष हैं तथा उस के अनुरूप आगे बढ़ने के अधिकारी भी हैं तथा आप के शुभचिंतको का भी इन में दख्ल देना विशेषतौर पर वर्जित विशेष ही हैं ...! इसी तरह से आप के निज़ी जन जिन्होने आप को जन्म तक दिया हैं उन्हे भी अपने फैसले लेने का निज़ी अधिकार विशेष हैं अर्थात वो अपनी अर्निंग A to Z समाज़ सहीत समाज़ के किसी भी अंग विशेष से शेयर करे – आप को कोई भी किसी भी प्रकार का अधिकार विशेष नंही हैं उन के फैंसलो में दख्ल विशेष देने का ...? आप अपनी ज़िन्दगी को अपनी शर्तो पर जीने हेतू पूर्णत्या स्वतंत्र विशेष हैं – उसी तरह से आप के शुभ चिन्तक विशेष भी ...!

Ø युवा यथासंभव जितना भी हो सके फेसबुक (or other similar social networking sites)  नाम की मरीचिका विशेष से अवश्य ही दूरी बनाये रखें ...! केवल अति आवश्यकता की स्थिती में ही पहले अपनी तथा अपने परिवार की सुरक्षा हेतू उपलब्ध सभी आवश्यक सुरक्षा विशेष के उपायों को व्यवहारिक रूप से अपनाये अथवा स्थापित विशेष करे – फिर उस के उपरान्त ही इस टैकनोलोजी की तरफ अगला कदम बढ़ाये – लेकिन सावधान ! कभी भूले अथवा गलती से भी अपनी तथा अपने परिवार की निज़ी जानकारी विशेष को किसी भी रूप या प्रकार से कभी भी किसी भी अवस्था विशेष में भी – किसी भी दूसरे यानी के अनजान से “ शेयर विशेष ” किसी भी किमत अथवा स्थिती पर भी न करे – अतः गलती होने पर “ सब कुछ तुरन्त विशेष बदले तथा अपने सम्बन्धित जनो विशेषो को इतलाह भी करे – केवल अपने ही निज़ी हित विशेष हेतू ...! ब्लकि यह सावधानी अपने जानकारो विशेषो पर भी अपनायें क्योंकि पता नंही कब कौन भेड़  की खाल में खूनी लोभी भेड़िया छुपा बैठा हैं घात लगाये ...! किसी भी कितनी भी अपवादिक स्थिती में भी अपने निज़ी शुभचिन्तक से यह स्थिती अवश्य ड़िसकस करें ...!

Ø अकेले स्त्री-पुरूष जो किसी भी कारण विशेष से ऐसी स्थिती में हैं वे भी अफेयर के बदले वैवाहिक स्थिती को ही अपनाये न की समाज़ में अमर्यादित गंद विशेष फैलाते फिरें ...! अफेयर यानि के कोई भी कार्य जो छुप कर किया जाता हैं – तो जान लो कि आप के मन-मस्तिष्क में कंही अवश्य ही अपराधिक वृति पोषित विशेष हो रही हैं जो आगे चल कर अवश्य ही आप को कटघरे में खड़ा होने के लिये केवल मज़बूर विशेष ही नंही करेगी ब्लकि हो सकता हैं कि आप को मनुष्य जन्म से ही हाथ धोना पड़ जाये ...! इस लिये सदा किसी भी अमर्यादित सम्बन्ध विशेष से सावधान ही रहें अर्थात मन-मस्तिष्क पर लगाम कस “ ज्ञान ” की यानी के “ ज्ञान का बधा मन रहें – गुर ( केवल रागमई प्रकाशित आवाज़ )  बिन ज्ञान न होय । ” ज्ञान अर्थात नाम  -प्रभू  -वर्ड़ – ताओ - लागोस वगैरह-वगैरह यानि के “ ज्ञान न गली ढूडिये – कथना करड़ा सार ” । अर्थात यह ज्ञान जानकारी से कदापी भी नंही ब्लकि निज़ी तौर पर कमाने से ही केवल उपलब्ध विशेष होता हैं ...! अतः केवल यही उपलब्ध ज्ञान विशेष ही मन-मस्तिष्क को पोज़ीटिव दिशा विशेष में चलाने में घौर समर्थ विशेष हैं तकनीकी तौर पर प्रत्येक “ विशेष काल ” में भी ...!

Ø वैवाहीक स्त्री-पुरूष भी सदा अपने को संयम में ही रखे तथा कभी भूले से भी पर स्त्री-पुरूषो के निज़ी दायरों में दख्ल देने का मानसिक रूप से भी प्रयास न ही करें तो उन के लिये यही लाभकारी हैं – अपनी निज़ी गृहस्थ तथा बच्चों की आवश्यक सुरक्षा हेतू...! किसी भी प्रकार के असंतोष की अवस्था विशेष में तलाक ले कर योग्य अनुरूप साथी की तलाश करे तथा नये सिरे से अपनी पिछली जिम्मेदारियों को भी पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हुऐ अगली आवश्यकताओं  को भी पूरा करते हुऐ – एक अच्छी सात्विक गृहस्थि विशेष का निर्माण करते हुऐ – स्वंय को एक अच्छा सामाजिक अंग के रूप में स्थापित करें । केवल संतोष ” का ही खज़ाना विशेष निरन्तर मेहनत करते हुऐ अर्जित विशेष करें तथा अपनी समस्त वासना विशेष को अपने आधार विशेष तक पहुंचने हेतू ही खर्च विशेष करे ताकि आप का दुर्लभ आवश्यक मनुष्य जन्म विशेष सार्थक हो सके ...! “ बड़े भाग मनुष्य तन पावा – सुर दुर्लभ सभ ग्रन्थ गावा । इस पउड़ी ते जो नर चूके – आई जाई बहुत-बहुत दुख पाईदा । ” अर्थात यह दुर्लभ मौका विशेष पता नंही फिर कब कौन से कल्प विशेष में मिलेगा कोई नंही जानता ...? अतः तुरन्त इसे सार्थक बनाने में ही निरन्तर व्यस्त विशेष रहो अर्थात किसी भी और अमर्यादित के लिये मानसिक रूप से भी समय ही उपलब्ध न रहें आखिरी धड़कन रूपी दुर्लभ मनुष्य जन्म तक ।

       जैसे ही आप सभी आवश्यक सामाजिक मर्यादाओं से हट कर मानसिक रूप से भी विचार विशेष करते हैं तो जान लो कि आप अपने ही हाथ से केवल अपने ही लिये अत्यन्त भयानक तड़पाने वाले नरकों विशेषो को भोगने के लिये आवश्यक सामान विशेष एकत्र करने लग जाते हैं जो आप को ऐसे भुगताये जायेंगे जैसे कि बच्चे को शहद चटाया जाता हैं ...? फिर आप किन्ही भी महानतम उपायो विशेषो द्वारा भी इस के एक महीन से जर्रा विशेष से बच ही नंही सकते ...!

Ø कोई निज़ी अथवा सामाज़िक आज़ादी किसी भी प्रकार से सार्थक अथवा लाभकारी नंही हो सकती अगर उस की आवश्यक निर्धारित सीमा विशेष न रखी जाये । निर्धारित सीमा विशेष के अभाव में आप की कोई भी आवश्यकता कब आप की आदत और फिर वासना विशेष बन जायेगी आप को पता भी नंही चलेगा और फिर कब आप तड़पते हुओ वासनाओं को पूरा करने के चक्कर में मृत्यु के द्वार पर खड़े होंगे खाली हाथ विशेष मलते हुऐ आप सोच भी नंही सकते ...? ओर आप को खाली हाथ ही लोटना पड़ेगा केवल तड़पते हुऐ अपने को शर्मिन्दगी में लपेटे हुऐ ...! इसलिऐ “ व्यापारी सच व्यापार करो ...। ” केवल इसी आवश्यक कमाई विशेष हेतू ही तू इस जगत रूपी तमाशे में अवतारित विशेष हुआ हैं “ हे आत्मा ” विशेष तौर पर ...! और तू हैं कि “ लगा कित कुफकड़े सब मुकदी चली रैन ...!

       अर्थात सीमा के अभाव में आज़ादी का अर्थ केवल मनुष्य अथवा समाज का केवल निर्धारित निश्चित पतन विशेष ही हैं प्रत्येक काल में ...! अतः आवश्यक रूप से अपनी प्रत्येक छोटी बड़ी आवश्यकता की अवश्य ही सीमा रेखा निर्धारित अथवा स्थापित विशेष करें “ प्रत्येक छोटी सी के लिये भी ” – कितनी भी दूसरी कीमत विशेष चुका कर के भी – केवल तभी आप संतोष के खज़ाने को प्राप्त करने में समर्थ अथवा सार्थक विशेष हो सकते हैं तथा इसी में आप का आधार यानि के आप की मंज़िल विशेष भी छुपी बैठी हैं ...!

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